हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट अनुसार, आयतो और हदीसो के संबंध मे बातचीत का लुफ्त अकसर ईमान और इरफ़ान का नतीजा होता है। आयतुल्लाह मुहम्मद हादी तालेही के वालिद जो एक पूर्ण रहस्यवादी, मुफ़्ती और रिवायतो और हदीसो पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाले व्यक्ति थे, कोई बात ऐसी नही थी जो उन्हे किसी आयत या हदीस के बारे मे बातचीत से अधिक खुश करती है। वास्तव मे किसी रिवायत या आयत की तफ़सीर पर बात से पहले लुत्फ़ अंदोज़ होते थे।
उनके कुछ लेखो मे उन्होने लिखा है कि हर मुसलमान पर अपने जीवन मे कम से कम एक बार मासूरा दुआओ या आमाल को ज़ूरूर अदा करना चाहिए।
उनके जीवन के अंतिम दिनो मे मैने कई बार देखा कि वह नींद मे भी एक नमाज, अक़ामत से लेकर सलाम तक नमाज़ अदा करते थे, जैसे जागते हुए पढ़ रहे हो, कभी कभी तो मुझे यह गुमान होता था कि वह जागे हुए है, मगर जब मै जाकर देखता तो पाता कि वह नींद मे ही नमाज़ पढ़ रहे है।
उन्हे बुहत सी दुआए कंठस्थ थी, वह नमाज़ो के क़ुनूत मे विभिन्न दुआए पढ़ते थे यहा तक कि जब वह इमामत करते थे तो क़ुनूत मे अलग अलग दुआए पढ़ते थे। कभी कभी वह कोई ऐसी दुआ पढ़ते जिसे मैने कबी नही सुना था, मै पूछता यह दुआ कौनसी है वह जवाब देते फ़ला किताब मे है।
यादनामा, पेज 26-27
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